काग़ज़ पर लिखा था — “हम भारत के लोग…”
और यहीं से शुरू हुआ सबसे बड़ा व्यंग्य।
हम लोग?
कहाँ हैं वो लोग?
यहाँ तो बस भीड़ है,
जो उँगली पर स्याही लगाकर
ज़मीर को साबुन से धो लेती है।
संविधान अब अलमारी में रखा
दादी-नानी की रामायण-सा पवित्र है,
जिसे पढ़ता कोई नहीं,
बस शपथ में उद्धृत कर
राजनीति की रोटी सेंकी जाती है।
आजादी की चीखें
जिन गलियों में गूँजी थीं,
वहीं अब
सेल्फी, स्मार्ट-फोन और सन्नाटा बिकता है।
भगत सिंह की तस्वीर पर माला है,
पर उनके सवालों पर ताला है।
हम पढ़े-लिखे हैं —
डिग्रियाँ दीवारों पर टंगी हैं,
पर इंसानियत?
वो तो शायद सिलेबस में थी ही नहीं।
ज्ञान में पीएचडी,
चरित्र में फेल,
और नैतिकता में बैकलॉग लेकर
गर्व से कहते हैं — “हम सभ्य हैं”!
गणतंत्र दिवस पर
झंडा ऊँचा, विचार नीचे,
भाषण लंबे, इरादे छोटे,
देशभक्ति बस
डीपी बदलने तक सीमित।
कितने शर्मिंदा होते होंगे
वो शहीद,
जो फाँसी पर हँसते हुए बोले थे —
“इंकलाब ज़िंदाबाद!”
और हमने उसे बना दिया
बस एक नारा…
साउंड सिस्टम का।
हम आज़ादी की दहाड़ों की औलाद,
पर निकले गूँगे,
इतिहास के वारिस,
पर निकले कंगाल,
सोने की चिड़िया के सपने वाले,
पर खुद ही उस चिड़िया के शिकारी।
प्रकृति का नियम सरल था —
इंसान बनो।
हमने उसे जटिल कर दिया —
जाति, धर्म, नफ़रत और दलदल से।
अब शायद
कहीं आकाश में
प्रसाद, आंबेडकर, नेहरू
एक-दूसरे से पूछते होंगे —
“क्या इन्हीं के लिए लिखा था हमने संविधान?”
और धरती पर हम —
राष्ट्रगान में सीधे खड़े,
पर सच के सामने हमेशा झुके हुए।
शायद किसी दिन
भीड़ से सचमुच
“हम भारत के लोग” निकलें…
तब गणतंत्र आएगा,
वरना
ये बस छुट्टी का दिन ही रहेगा।
जय हिंद!
जय भारत 🇮🇳
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