22 जनवरी: सनातन गौरव का अंग्रेज़ी संस्करण
हम सनातनी हैं।
हमें इस पर गर्व है।
इतना गर्व कि हमने अपने धर्म को भी ग्रेगोरियन कैलेंडर में डालकर इंस्टॉल कर लिया है।
तिथि बनाम तारीख़: प्राण प्रतिष्ठा की वर्षगाँठ का पंचांगीय सच
राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी 2024 को संपन्न हुई थी, लेकिन इसकी वर्षगाँठ ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार नहीं, बल्कि हिंदू पंचांग की तिथि—पौष शुक्ल द्वादशी के आधार पर मानी जाती है।
इसी कारण वर्षगाँठ की गणना में एक रोचक स्थिति सामने आती है।
पंचांग के अनुसार,
पहली वर्षगाँठ 11 जनवरी 2025 को आई,
जबकि दूसरी वर्षगाँठ उसी वर्ष 31 दिसंबर 2025 को पड़ गई।
चूँकि पौष शुक्ल द्वादशी की तिथि 2025 में दो बार आ चुकी, इसलिए 2026 में यह तिथि नहीं पड़ेगी, और परिणामस्वरूप उस वर्ष प्राण प्रतिष्ठा की कोई वर्षगाँठ नहीं होगी।
यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि हिंदू परंपरा में तिथि की प्रधानता होती है, तारीख़ की नहीं, और इसी कालगणना के अनुसार धार्मिक आयोजनों की पुनरावृत्ति तय होती है।
और अब!
22 जनवरी—
अब यह कोई साधारण तारीख़ नहीं रही।
यह आस्था का Day-मोन्यूमेंट है।
हर साल आएगी, ठीक वैसे ही जैसे 25 दिसंबर, 14 फरवरी और 1 जनवरी आती है।
बस फर्क़ इतना है कि हम इसे सनातन कहेंगे।
विडंबना यह है कि जिस रामलला प्राण-प्रतिष्ठा को हम 22 जनवरी की स्थायी वर्षगाँठ बना चुके हैं,
वह न हिंदू पंचांग के अनुसार स्थायी है,
न तिथि के अनुसार,
न नक्षत्र के अनुसार।
पर सवाल यह नहीं है कि तिथि क्या थी—
सवाल यह है कि ट्रेंड क्या है।
तिथि गई, भावना रह गई (फेसबुक पोस्ट के साथ)
हिंदू शास्त्र कहता है—
तिथि प्रधान होती है, तारीख़ नहीं।
पौष शुक्ल द्वादशी—
यही वह तिथि थी जिस पर प्राण-प्रतिष्ठा हुई।
और अब ज़रा ध्यान दीजिए इस छोटे से, असुविधाजनक तथ्य पर—
2026 में पौष द्वादशी
31 दिसंबर 2025 की रात से
1 जनवरी 2026 तक थी।
यानी जिस समय
हम हैप्पी न्यू ईयर के स्टेटस,
केक काटने और
“New year, new me” की कहानियों में व्यस्त थे,
उसी समय प्राण-प्रतिष्ठा की वास्तविक तिथि चुपचाप निकल गई।
लेकिन कोई बात नहीं।
आस्था को क्या ज़रूरत है पंचांग की,
जब व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी उपलब्ध है?
सनातन 2.0: रीब्रांडेड फ़ॉर कन्वीनियंस
आज का सनातन धर्म बड़ा समझदार हो गया है—
वह कठिन नियमों से नहीं,
सुविधाजनक तारीख़ों से चलता है।
उपवास? → अगर ऑफिस की मीटिंग न हो तो
तिथि? → अगर रविवार पड़ जाए तो
पंचांग? → PDF में हो तो देख लेंगे
हम गर्व से कहते हैं—
“हम हिंदू हैं, सनातनी हैं।”
लेकिन
हमने तिथि छोड़ दी,
पंचांग छोड़ दिया,
कालगणना छोड़ दी—
और पकड़ ली 22 जनवरी,
क्योंकि वो याद रखने में आसान है।
आस्था अब साधना नहीं,
एनुअल इवेंट है।
राम तिथि में आए थे, हम तारीख़ में अटक गए
राम का जन्म भी तिथि से जुड़ा है,
दीपावली भी तिथि से,
होली भी तिथि से।
लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा?
नहीं, वो अब फिक्स डेट है—
क्योंकि तिथि बदल जाती है,
पर हैशटैग नहीं।
हम तर्क देते हैं—
“भावना ज़रूरी है।”
बिलकुल।
लेकिन फिर यह भी स्वीकार कीजिए कि
आप सनातन परंपरा नहीं,
सनातन प्रतीकवाद मना रहे हैं।
अंत में एक विनम्र-सा प्रश्न
अगर
तिथि मायने नहीं रखती,
पंचांग अप्रासंगिक है,
कालगणना सिर्फ़ सुविधा है,
तो फिर
हम सनातन किस अर्थ में हैं?
परंपरा में?
या पोस्टर में?
शायद हम उस पीढ़ी के हिंदू हैं
जो गर्व से कहते हैं—
“हमें सब पता है,”
और फिर कैलेंडर देखकर पूछते हैं—
“अच्छा, इस साल 22 जनवरी कौन-सा वार है?”
जय श्री राम।🚩
पर तिथि देख लेना—
अगर वक़्त मिले तो।
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